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भ्रष्टाचार के खिलाफ भारत समर्थक

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भ्रष्टाचार के विरुद्ध थे महावीर


ईसा से लगभग छह सौ वर्ष पूर्व चैत्र शुक्ल त्रयोदशी के दिन वैशाली नगर के ज्ञातृवंशी कश्यप गोत्र के क्षत्रिय राजा सिद्धार्थ तथा माता त्रिशला के राजमहल में बालक वर्धमान ने जन्म लिया, जिसने बड़े होकर महावीर स्वामी के रूप में अध्यात्म को सर्वोपरि बतलाकर संपूर्ण चिंतन धारा को नई दिशा दी।

महावीर जी ने देखा कि भारत में धर्म के नाम पर मात्र कोरा कर्मकांड ही चल रहा है, जबकि अध्यात्म क्षीण हो रहा है। उसी समय उन्होंने अनुभव किया कि बिना अध्यात्म के आत्मकल्याण संभव नहीं है। सांसारिक बंधनों से मुक्त होने के लिए अ‌र्घ्य चढ़ाने से कुछ नहीं होता, बल्कि कुछ और भी है, जो मनुष्य को सुखी होने का रास्ता दिखला सकता है।

शुरुआत उन्होंने अपने जीवन से की। दूसरों को उपदेश देने की अपेक्षा स्वयं सत्य खोजने का मार्ग अपनाया। उन्होंने राजपाट छोड़ दिया। इससे उन्होंने युवाओं को विलासिता छोड़ने की प्रेरणा दी। महावीर का सिद्धांत था जिओ और जीने दो। वे कहते थे- जैसे तुम चाहते हो, वैसे ही दूसरे भी चाहते हैं कि उन्हें शांति से जीने दिया जाए। इसलिए मजदूरों से ज्यादा काम लेना या उन्हें कम मजदूरी देना भी अपराध है। वे हर तरह के शोषण के खिलाफ थे।
महावीर

महावीर स्वामी कहते हैं कि मन, वचन और शरीर से किसी भी प्राणी को पीड़ा नहीं पहुंचानी चाहिए। महावीर कहते हैं, तुम बाहर मित्रों को क्यों ढूंढते हो, तुम खुद ही अपने मित्र हो और खुद ही अपने शत्रु। तुम्हें मित्रता, मधुरता और मिठास पानी है तो उसे अपने अंदर देखो।

व्यक्ति समाज की इकाई है, इसलिए सबसे पहले इंसान को खुद ही चरित्र निर्माण व सुसंस्कृत होने की जरूरत है। इसके बाद समाज खुद ही सुव्यवस्थित हो जाएगा। इसलिए महावीर कर्तव्यों के लिए प्रेरित करते हैं। हर व्यक्ति कर्म की तरफ झुकेगा तो परिवार, समाज और राष्ट्र का उत्थान अपने आप होगा।

महावीर स्वामी ने कहा, इच्छाएं तो आकाश की तरह अनंत हैं। इसलिए इन्हें बढ़ाने में सुख कतई नहीं है। इच्छाओं को रोकने में ही सुख है।?वे परिग्रह [संग्रह] के विरुद्ध थे।

महावीर स्वामी जनता के अनुसार राज्य की कल्पना करते थे, न कि शासक के अनुसार। आज भ्रष्टाचार बढ़ गया है। हम कानून तो बना सकते हैं, लेकिन कानून का पालन करने की व्यवस्था नहीं पैदा कर सकते। इसके लिए हमें उन्हीं शाश्वत मूल्यों की तरफ देखना पड़ेगा, जो महावीर स्वामी ने सुझाए थे।

हम केवल दो बातों को लें- सादगी और संतोष। आज एक क्लर्क भी महंगे कपड़े, महंगी गाड़ी, ऊंची इमारत, हवाई यात्रा आदि के लिए प्रयास करता है। जबकि सादगी का सिद्धांत तो यह है कि करोड़पति भी हो, तो भी जीवन सादा हो। संतोष भी नहीं रखेंगे तो इच्छाएं अनंत होंगी। सादगी रहेगी तो जरूरतें कम से कम होंगी। संतोष होगा, तो इच्छाएं परेशान नहीं करेंगी

परिवार के साथ सारी जिम्मेदारियों को निभाते हुए सादगी और संतोष के साथ रह पाना आज के युग में ज्यादा बड़ी साधना है। सच्चे सुखी जीवन का एकमात्र उपाय सादगी और संतोष है, जिसके बिना भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। महावीर का अपरिग्रह का सिद्धांत भ्रष्टाचार की समस्या का ही तोड़ है।

डॉ. अनेकांत कुमार जैन
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