भ्रष्टाचार के खिलाफ भारत समर्थक
दिल्ली में बिजली सप्लाई में भ्रष्टाचार पर केजरीवाल का हल्ला बोल
बिजली की बढ़ी कीमतों को लेकर दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार और अरविंद केजरीवाल आमने सामने आ गए हैं. केजरीवाल ने लोगों से बिल ना भरने को कहा है तो दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने बिल ना भरने का खामियाजा भुगतने की चेतावनी दे दी है.
दिल्ली में बिजली की बढी कीमतों को लेकर राजनीति गरमा गई है, अरविंद केजरीवाल और इंडिया अगेंस्ट करप्शन के कार्यकर्ताओं ने बिजली की बढ़ी कीमतों के खिलाफ रविवार को दिल्ली में जबर्दस्त प्रदर्शन किया.
इस मौके पर कीमत बढ़ाए जाने के विरोध में बिजली बिल को जलाया गया. अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के लोगों से कहा कि जब तक सरकार बढी हुई कीमतें वापस ना ले वो अपना बिजली का बिल ना भऱें.
केजरीवाल की इस धमकी के बाद दिल्ली सरकार ने भी चेतावनी दे दी है कि जो बिजली बिल नहीं भरेगा उसे भुगतना पड़ेगा. अब देखना होगा कि जनता सरकार की सुनती है या केजरीवाल की.
बिजली बिल के मुद्दे पर केजरीवाल और दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार आमने सामने हैं. केजरीवाल ने सरकार को 15 दिन का वक्त दिया है और अगर 15 दिन में कीमतें वापस नहीं हुईं तो वो इस आंदोलन को तेज करने की धमकी दे रहे हैं.
केजरीवाल ने पैसे पेड़ पर ना लगने वाले बयान को लेकर प्रधानमंत्री पर भी हमला बोला. यानी आने वाले दिनों में केजरीवाल का आंदोलन दिल्ली और केंद्र की सरकार दोनों का सिरदर्द बन सकता है.
पैसा पेड़ों पर नहीं उगता है: मनमोहन सिंह
- विपक्ष के बहकावे में न आयें देशवासी : मनमोहन
- आर्थिक सुधार न करते तो डूब जाती अर्थव्यवस्था
- विश्वव्यापी मंदी के असर से देश को बचाना जरूरी
नई दिल्ली : आर्थिक सुधारों पर मचे घमासान और तृणमूल सांसदों द्वारा आज दिये गये इस्तीफों को स्वीकार करने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देशवासियों को संबोधित करते हुए कहा कि देशवासियों को आर्थिक सुधार के मुद्दे पर सच्चाई जानने का हक है। मनमोहन सिंह ने देशवासियों से विपक्ष के बहकावे ने आने की अपील करते हुए कहा कि विपक्ष के नेता देश की सही स्थिति को नहीं बता रहे हैं। आज की कठिन आर्थिक स्थिति में वे स्वार्थ की राजनीति कर रहे हैं।
देशवासियों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि पीएम होने के नाते यह जरूरी है कि मैं कड़े कदम उठाऊं। यूरोपीय देशों में तमाम संकट मुंह बाएं खड़े हैं। अपना खर्च उठाने में सक्षम नहीं है। वेतन देने के लिए कर्ज मांग रहे हैं। मेरा वादा है कि भारत में ऐसा नहीं होने दूंगा। डीजल पर होने वाले घाटे को कम करने के लिए १७ रुपये मूल्य बढ़ाने की जरूरत है लेकिन हमने सिर्पâ पांच रुपये बढ़ाए। पेट्रोल के दाम न बढ़ने देने के लिए हमने पेट्रोल पर टैक्स पांच रुपये तक कम किया है। एलपीजी सिलेण्डर की संख्या घटाए जाने पर प्रधानमंत्री ने कहा कि देश की आधी आबादी महज ६ सिलेण्डर ही इस्तेमाल करती है। उन्होंने कहा कि आज देश में आमदनी के मुकाबले खर्चे ज्यादा है। प्रधानमंत्री ने कहा कि गरीबों को ध्यान में रखते हुए सरकार ने घासलेट की कीमतों को नहीं बढ़ाया। मनमोहन िंसह ने कहा, पिछले साल तेल पर साqब्सडी एक लाख चालीस हजार करोड़ रुपये थी। इस साल दो लाख करोड़ हो जाती। जो देश के आर्थिक विकास के लिए नुकसानदायक बन जाती।
प्रधानमंत्री ने कहा सरकार आम आदमी पर बोझ नहीं डालना चाहती, लेकिन आज देश में ८० फीसदी कच्चा तेल विदेश से आता है । इसे खरीदने के लिए पैसे कहां से आयेंगे, वित्तीय घाटा बढ़ जाएगा। इसलिए मजबूरी है कि तेल की कीमतें बढ़ाई जाएं। निवेशकों का विश्वास भारत में कम हो जाता। देश में पैसा नहीं आता। बेरोजगारी बढ़ जाती। देश को बाहर से कर्ज नहीं मिलता। ब्याज बढ़ जाता है। उन्होंने विपक्षी नेताओं पर चुटकी लेते हुए कहा इन सबके लिए पैसों की जरूरत है और पैसे पेड़ों पर नहीं लगते। इसलिए अब उठाए गए कदमों के अच्छे नतीजे आएंगे।
प्रधानमंत्री ने एफडीआई के मुद्दे पर विपक्षी राजनीतिक दलों की आशंकाओं को खारिज करते हुए कहा कि एफडीआई से लोगों को रोजगार मिलेगा, किसानों को उसकी फसल के अच्छे दाम मिलेंगे। उन्होंने विपक्ष को स्वच्छ राजनीति करने की सलाह देते हुए कहा कि कांग्रेस ने हमेशा जनहित में काम किया है। इसीलिए हमें जनता ने दूसरी बार भी चुना है। इसलिए हमारा फर्ज बनता है कि हम जनता के हित में काम करें। आज देश की आर्थिक स्थिति को देखते हुए आर्थिक सुधारों को और कड़ा करना होगा। यही देश की और जनता की मांग है। मुझे विश्वास है कि देशवासी पिछली बार की तरह ही इस बार भी हमारा साथ देंगे।
अन्ना ने ठुकराया केजरीवाल के दो करोड़
नई दिल्ली - इंडियन एक्सप्रेस अखबार के मुताबिक अन्ना हजारे ने अरविंद केजरीवाल के 2 करोड़ रुपए का ऑफर ठुकर दिया. कुछ महीने पहले अरविंद केजरीवाल आंदोलन के बचे हुए पैसों का चेक लेकर अन्ना को देने गए थे लेकिन अन्ना ने चेक लेने से इनकार कर दिया.
क्या अरविंद केजरीवाल से अलग होने के बाद अब अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन के नाम पर जमा हुआ पैसा भी इस्तेमाल नहीं करेंगे.
ये सवाल इसलिए क्योंकि आंदोलन के नाम पर जो चंदा जमा किया गया उसमें से बचे हुए पैसों को भी लेने से अन्ना हजारे ने मना कर दिया.
इंडियन एक्सप्रेस अखबार में छपी खबर के मुताबिक अरविंद केजरीवाल के एनजीओ पब्लिक कॉज रिसर्च फाउंडेशन ने इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन के बचे हुए पैसे अन्ना को देना चाहा लेकिन अन्ना ने इसे लेने से मना कर दिया.
अखबार के मुताबिक कुछ महीने पहले केजरीवाल ने रालेगण सिद्धी पहुंचकर चंदे की बची हुई रकम के तौर पर अन्ना को तकरीबन 2 करोड़ का चेक देना चाहा लेकिन अन्ना ने इस चेक को लेने से इनकार कर दिया.
अरविंद ये पैसे इसलिए अन्ना को देने गए थे क्योंकि ये पैसे राजनीतिक पार्टी के लिए नहीं बल्कि आंदोलन के लिए मिले थे. और चूंकि अब अन्ना ही आंदोलन को आगे बढाएंगे इसलिए ये पैसा वो अन्ना को देने गए थे.
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक टीम अन्ना के कोर ग्रुप में शामिल रहे पूर्व सदस्य दिनेश वाघेला ने भी केजरीवाल के इस ऑफर की पुष्टी की है. इस बारे में अब तक अरविंद केजरीवाल का पक्ष सामने नहीं आया है.
अखबार के मुताबिक 20 सितंबर को अन्ना जब दिल्ली में थे उस दौरान महाराष्ट्र सदन में अन्ना के सहयोगियों की बैठक में भी ये मामला गरमाया था लेकिन अन्ना ने अपने समर्थकों को निर्देश दिया कि इंडिया अगेंस्ट करप्शन से आंदोलन का डाटा बेस को लेने की कोशिश की जाए लेकिन चंदे में से बचे पैसे को वापस नहीं लिया जाएं. अखबार के मुताबिक बैठक में अन्ना ने कबूल किया कि अरविंद चेक वापस कर रहे थे लेकिन उन्होंने इसे लेने से इनकार कर दिया.
फिलहाल इंडिया अगेंस्ट करप्शन के पास कुल कितना पैसा है ये तो नहीं पता है लेकिन हम आपको बता दें कि कि इंडिया अगेंस्ट करप्शन की ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक साल 2011 में 1 अप्रैल और सितंबर 30 यानि 6 महीने के दौरान आईएसी को आंदोलन के नाम पर कुल 2.94 करोड़ रुपये का चंदा मिला जिसमें से 1 करोड़ 14 लाख रुपये अकेले रामलीला मैदान आंदोलन के दौरान चंदे में मिले.
रिपोर्ट के मुताबिक आईएसी ने इस दौरान कुल 1 करोड़ 57 लाख रुपये खर्च भी दिखाया था. नवंबर 2011 में आई इस ऑडिट रिपोर्ट के बाद आईएसी ने अब तक दूसरी रिपोर्ट जनता के सामने पेश नहीं किया है. हालांकि जुलाई महीने के जंतर-मंतर आंदोलन के दौरान चंदे के तौर पर साढ़े 39 लाख लाख रुपये जमा होने की बात कही गई थी. चंदे के नाम पर जमा हुए पैसों में से खर्च होने के बाद जो पैसे शेष हैं फिलहाल वो पीसीआरएफ के खाते में जमा है.
ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि अन्ना हजारे ने केजरीवाल और इंडिया अगेंस्ट करप्शन से तो अपना नाता तोड़ लिया है लेकिन आंदोलन के नाम पर जमा चंदे की राशि का क्या होगा?
घोटालों से निपटने की अद्भुत कला
पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव अद्भुत विरासत छोड़ गए हैं। भले ही लोग भारत में आर्थिक सुधार का श्रेय वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को देते हैं, लेकिन इसके असली शिल्पकार नरसिम्हा राव थे। इकनॉमिक टाइम्स के टी. के. अरुण ने एक बार कहा था , ‘डॉ मनमोहन सिंह को सुधार का श्रेय देना वैसे ही है, जैसे आप बुकर सम्मान के लिए अरुंधती रॉय के वर्ड प्रोसेसर को क्रेडिट दें।‘ राव इससे भी प्रभावकारी एक और विरासत छोड़ गए। संकट से निपटने की उनकी कला पर वर्तमान नेता फल-फूल रहे हैं लेकिन कभी भी इसका श्रेय उन्हें नहीं दिया।
हमारे समय के लोग जानते हैं कि राव इस खेल में कितने निपुण थे। आम धारणा थी कि अगर कोई बड़ा विवाद हो और सरकार उसमें घिर गई हो, तो तय था कि एक दूसरा बड़ा मुद्दा पहले मुद्दे से लोगों का ध्यान हटा देता था। अगर ऐसा नहीं होता, तो उसे इतनी खूबसूरती से दूसरा मोड़ दे दिया जाता ताकि सबका ध्यान बंट जाता। बहुत सारे लोगों को याद होगा कि वह हर्षद मेहता विवाद में अटैची में एक करोड़ रुपये लेने के आरोपी थे। बहस का मुद्दा यह होना चाहिए था कि उन्हें पैसे मिले या नहीं, अगले दिन ज्यादातर चर्चाएं इस बात पर केंद्रित थीं कि अटैची कितनी बड़ी थी? क्या एक आदमी इसे खींच सकता था? और कितने के नोट थे? भ्रष्टाचार का असल मुद्दा और क्या हर्षद मेहता राव से मिले थे, इन पर शायद ही चर्चाएं हो पाईं।
चारों ओर से घिरी वर्तमान यूपीए सरकार तृणमूल कांग्रेस के समर्थन वापस लेने से प्रकट रूप से संकट में फंसी दिख रही है। लगता है कि यह सरकार अच्छी तरह से राव के नक्शेकदम पर चल रही है। आप इस सरकार के घोटालों की लिस्ट देखिए और आपको समझ में आ जाएगा कि इस सरकार ने राव से किसी मोर्चे पर तो बेहतर किया है। एक घोटाले के बाद दूसरा घोटाला हो जाता है और लोगों का ध्यान पहले घोटाले पर से हट जाता है। हाइपर-ऐक्टिव मीडिया भी आगे बढ़ जाता है, क्योंकि पहले वाला ‘विशाल घोटाला’ ठंडे बस्ते में चला जाता है।
यह व्यवस्था घोटाले के सूत्रधारों के लिए अच्छी तरह से काम करती है। नित नए घोटाले सामने आने से उन्हें सुस्ताने का वक्त मिल जाता है। घोटाले में फंसा व्यक्ति जानता है कि कोई नया घोटाला आते ही सबका ध्यान कुछ समय के लिए दूसरों पर चला जाता है और वह इस तरह सीना चौड़ा करके घूमता है जैसे कुछ हुआ ही न हो।
इसे समझने के लिए यहां कुछ घोटालों का जिक्र कर रहा हूं। कैश फॉर वोट और हसन अली हवाला घोटाला 2008 में, मधु कोड़ा माइनिंग घोटाला और सुकना जमीन घोटाला 2009 में, कॉमनवेल्थ गेम्स और आदर्श हाउसिंग घोटाला 2010 में। इसरो-देवास डील, टाट्रा ट्रक घोटाला, कुख्यात 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, कोल ब्लॉक आवंटन घोटाला, दिल्ली एयरपोर्ट जमीन घोटाला, सुनियोजित तरीके से एयर इंडिया/ इंडियन एयरलाइंस की ‘हत्या’ और पूर्व आर्मी चीफ वीके सिंह के उम्र को लेकर विवाद और सीवीसी की नियुक्ति में गड़बड़ी को लेकर विवाद। यह लिस्ट बढ़ती ही जाएगी।
जो मैं कह रहा हूं, वह एक सरसरी निगाह डालने पर भी समझा जा सकता है। अलग-अलग घोटाले अलग-अलग समय पर हुए और अलग-अलग लोग इनमें ऐसे जुड़े पाए गए जैसे किसी नाटक के पात्र हों। काफी हद तक यही लगता है कि पिछले घोटाले से ध्यान हटाने, पीछा छुड़ाने के लिए अ��ला घोटाला सामने आया। हो सकता है कि मैं ओवर-रिऐक्ट कर रहा होऊं या फिर निराशावादी हो रहा होऊं, लेकिन यह सब इतना अफसोसजनक है कि हाल ही में तृणमूल कांग्रेस का सरकार से हाथ खींच लेने की धमकी देना भी कुछ फर्क पैदा करता नहीं दिखता।
ये नेता लोगों को काफी ज्यादा बेवकूफ बनाते रहे हैं। जैसा कि मैं अक्सर कहता रहा हूं, ऐसा लगता है कि हमारे नेता पुरातन काल में रह रहे हैं। वे यह समझ ही नहीं पा रहे हैं कि दुनिया काफी आगे बढ़ चुकी है और भोले-भाले भारतीयों को बेवकूफ बनाने की जो चालें सालोंसाल से चलते आ रहे हैं, वे अब पूरी तरह से नाकामयाब हैं। हां, यह हो सकता है कि मीडिया पुराने मामले को छोड़कर नए मामले को टीआरपी के चक्कर में भुनाने लगता हो, लेकिन विशालकाय सोशल मीडिया, जिसका आधार दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है और जो ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच बना बना रहा है, का असर कोई आई-गई बात नहीं है। इस सोशल मीडिया को इग्नोर नहीं किया जा सकता।
लगभग हरेक घोटाला डॉक्युमेंटेड है और जो कोई भी इसे पढ़ना/देखना चाहे, यह सभी के लिए उपलब्ध है। बस इतना ही नहीं, जैसे ही यह लगता है कि कोई घोटाला अपनी मौत मर रहा है, अचानक कोई न कोई उसके बारे में कुछ न कुछ जरूर छेड़ देता है और वह फिर से चर्चा के दायरे में आ जाता है। शुक्र है। और सिर्फ इसीलिए मीडिया की नजरों में आने से बच गए इनमें से कई घोटाले जागरूक सिटिजन जर्नलिस्ट्स की नजरों से नहीं बच पाते। वे सभी अपराधियों को याद दिलाते रहते हैं कि लोग अब पहले से कहीं ज्यादा जागरूक हैं, और न सिर्फ यह कि वे उनकी करनियां भूलेंगे नहीं, बल्कि वे उनके कुकर्मों को उनके पास मौजूद प्लैटफॉर्म पर खूब दिखाएंगे-बताएंगे भी।
तो, जो लोग यह सोचते हैं कि वे मेरे देश को और निचोड़ते रहेंगे और बड़े आराम से निकल लेंगे, दोबारा सोचें!!
मनमोहन के कार्यक्रम में कमीज उतार कर किया विरोध
पीएम मनमोहन सिंह शनिवार को राष्ट्रीय राजधानी में विज्ञान भवन में आयोजित एक सम्मेलन के दौरान उस समय दंग रह गए, जब एक व्यक्ति मेज पर खड़ा होकर हाल में हुई डीजल मूल्य वृद्धि का विरोध करने लगा.
प्रधानमंत्री एशिया में आर्थिक विकास और औद्योगिक वातावरण में बदलाव पर अंतर्राष्ट्रीय अकादमिक सम्मेलन को सम्बोधित करने वाले थे.
प्रधानमंत्री, विज्ञान भवन के मुख्य सभाकक्ष में अपना उद्घाटन भाषण देने के लिए जैसे ही उठे, एक प्रदर्शनकारी ने उनके खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी. यह प्रदर्शनकारी डीजल मूल्य वृद्धि वापस लेने की मांग कर रहा था.
प्रदर्शनकारी अपनी कमीज उतार रखी थी. सुरक्षाकर्मी बाद में उसे सभाकक्ष से बाहर ले गए. खबर के मुताबिक इस शख्स का नाम संतोष कुमार सुमन है.
इस व्यवधान के बावजूद प्रधानमंत्री ने अपना सम्बोधन जारी रखा. उन्होंने समावेशी, तीव्र और स्थिर विकास की वकालत की और निजी क्षेत्र के विकास के लिए मौजूदा औद्योगिक व्यावसायिक कानूनों के परीक्षण का वादा किया.
प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार संसद में जल्द ही एक नया कम्पनी विधेयक लाएगी, जिससे औद्योगिक जगत की मौजूदा जरूरतों से निपटा जा सकेगा.
कौन है संतोष कुमार सुमन
विज्ञान भवन में पीएम मनमोहन सिंह के खिलाफ शर्ट उतारकर नारेबाजी करने वाला शख्स संतोष कुमार सुमन पेश से वकील है. इसके साथ ही वो लालू प्रसाद यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल से भी जुड़ा है.
प्रधानमंत्री के खिलाफ नारेबाजी करने वाला संतोष कुमार सुमन मूल रूप से बिहार के बेगूसराय का रहने वाला है, लेकिन फिलहाल वो दिल्ली के शकरपुर में रहता है. बत्तीस साल का संतोष कुमार सुप्रीम कोर्ट में वकील के तौर पर रजिस्टर्ड है.
उसके पिता का नाम जेएन महतो बताया जा रहा है. संतोष कुमार सुमन ने साल 2002 में बिहार के भागलपुर से वकालत की पढ़ाई पूरी की थी. संतोष लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी की दिल्ली यूनिट से जुड़ा था.
संतोष ने इससे पहले 2008 में कैश फॉर वोट के सिलसिले में दिल्ली हाईकोर्ट में एक पीआईएल दायर की थी. लेकिन हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए उस पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगा दिया था.
कांग्रेस की प्रतिक्रिया
कांग्रेस के तमाम नेताओं ने इस घटना की निंदा की और कहा कि इस मामले की पूरी जांच होनी चाहिए. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राशिद अल्वी ने कहा कि इस प्रकरण की जांच होनी चाहिए.
इसके साथ ही संसदीय कार्य राज्य मंत्री राजीव शुक्ल ने अपील की है कि ऐसे विरोध को ज्यादा तूल नहीं दिया जाए.
लालू ने की कार्रवाई
पीएम के कार्यक्रम के दौरान शर्ट खोलकर नारेबाजी करने वाला संतोष कुमार सुमन राष्ट्रीय जनता दल की दिल्ली इकाई का पदाधिकारी है. ये जानकारी मिलने पर आरजेडी राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने अपनी पार्टी की दिल्ली इकाई को ही भंग कर दिया.
लालू ने अपने इस फैसले का एलान पटना में पत्रकारों के सामने किया.
बीजेपी की प्रतिक्रिया
दिल्ली में प्रधानमंत्री के भाषण से पहले शर्ट खोलकर नारेबाजी किए जाने की घटना को बीजेपी ने आम लोगों के गुस्से का नतीजा करार दिया है. बीजेपी का कहना है कि मनमोहन सरकार से आम लोगों की नाराज़गी हर रोज बढ़ रही है
भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना अपनी मशाल जलाए रखें : राम जेठमलानी
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ram jethmalani |
चेन्नई: बीजेपी के नेता और राज्यसभा सदस्य राम जेठमलानी ने सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हज़ारे को पत्र लिखकर कहा है कि देश उनसे उम्मीद लगाए बैठा है और उन्हें भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए अपनी कोशिश जारी रखनी चाहिए.
जेठमलानी ने कहा कि अन्ना ने अरविंद केजरीवाल के राजनीतिक पार्टी के गठन का समर्थन नहीं करके अच्छा किया है और उन्हें एक ही मुद्दे पर लड़ना चाहिए.
जानेमाने वकील के मुताबिक देश संकट के दौर से गुजर रहा है और अन्ना को इस स्थिति से लड़ने के लिए सभी तरह के भेदभावों से ऊपर उठने की जरूरत है.
उन्होंने ने अपने पत्र में कहा कि आजादी के 65 साल बाद भी खुशियां मनाने के लिए कुछ नहीं है और यह सब भ्रष्टाचार के कारण हो रहा है.
बकौल जेठमलानी अल्पसंख्यकों की तरक्की होनी चाहिए और अन्ना को उनकी मांगों का भी ध्यान रखना चाहिए.
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