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अन्ना से अलग हैं इस आंदोलन के अंदाज

नई दिल्ली :  पिछले एक डेढ़ साल के दौरान दिल्ली ने कई जन आंदोलन देखे। अन्ना हजारे की अगस्त क्रांति हो या रामलीला मैदान में हुआ रामदेव का आंदोलन या फिर अन्ना से अलग होने के बाद आम आदमी पार्टी बनाने वाले अरविंद केजरीवाल के आंदोलन। लेकिन इंडिया गेट और विजय चौक पर शनिवार को यूथ के जो तेवर दिखे , वह सबसे अलग थे। न तो कोई नेता था , न कोई प्रतिनिधि। यही वजह थी कि सीपीएम लीडर वृंदा करात हो या कभी अन्ना के सहयोग रहे मनीष सिसौदिया या गोपाल राय , पब्लिक किसी को भी ज्यादा भाव नहीं दे रही थी और न उनकी बात सुनने के लिए तैयार थी। 

शनिवार दोपहर आंदोलन के दौरान एक युवती पोस्टर लेकर एक खंभे पर चढ़ रही थी और नीचे खड़ी कई युवतियां उसकी मदद कर रही थी , लेकिन जब हमने नीचे खड़ी युवतियों से ऊपर चढ़ रही युवती का नाम पूछा , तो उनका कहना था कि हम उन्हें नहीं जानते और हमें भी उनका नाम नहीं पता। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि लोग किस तरह जान पहचान को परे रखते हुए एक दूसरे के साथ जुड़े। 

हमने कई लोगों से पूछा कि क्या इस आंदोलन के लिए वो कहीं न कहीं अन्ना या रामदेव को क्रेडिट देते हैं , जिन्होंने लोगों को सड़कों पर उतर कर अपनी आवाज उठाना सिखाया , तो इस पर लोगों ने किसी को भी कोई क्रेडिट देने से साफ इनकार कर दिया। विजय चौक पर मौजूद अभिषेक जायसवाल और पूजा शर्मा का कहना था कि प्रोटेस्ट करने का जज्बा तो हमारे खून में शामिल है। इसी की बदौलत हमें आजादी मिली है। 

फिर आप यह कैसे कह सकते हैं कि लोग अन्ना या रामदेव या केजरीवाल के आंदोलनों से प्रेरणा लेकर यहां पहुंचे है। हम आम लोग हैं और वो सब हमारी बदौलत हैं , हम उनकी बदौलत नहीं। सृष्टि और शैली का कहना था कि जेसिका लाल हत्याकांड के समय भी ऐसे ही प्रोटेस्ट हुए थे। ये सिस्टम के खिलाफ जनता का गुस्सा है और इस आंदोलन का पूरा क्रेडिट सिर्फ उन लोगों को जाता है , जो अपना विरोध जताने यहां आए थे। ज्यादातर प्रदर्शनकारियों का मानना था कि उनके इस आंदोलन को कोई भी राजनीति रंग ना दे।


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