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इस देश में बेल होती है, जेल नहीं होती है : केजरीवाल



आम आदमी पार्टी के प्रमुख नेता अरविंद केजरीवाल ने आजतक चैनल के सीधी बात कार्यक्रम में हेडलाइंस टुडे के मैनेजिंग एडिटर राहुल कंवल से बातचीत की. पेश हैं प्रमुख अंश:

कांग्रेस आरोप लगा रही है कि आपने उनकी पार्टी का नाम चुरा लिया?
कांग्रेस बौखलाई हुई है. आम आदमी कभी भी कांग्रेस के साथ नहीं था. आंदोलन से जो नई पार्टी निकली है उसे देश के आम लोगों ने मिल कर बनाया है.

आपकी पार्टी बाकियों से किस तरह अलग है? आपको भी उसी दंगल में जाकर चुनाव लडऩा है.
हम इस खेल के रूल्स बदल रहे हैं. चुनाव जीतना हमारी रणनीति नहीं है. यह पैसे, भ्रष्टाचार और अपराध की राजनीति है पर हम देश की राजनीति को बदलने आए हैं. आज हर पार्टी में बेटे/बेटी को टिकट मिलता है. हमने अपने संविधान में लिखा है कि परिवार के एक व्यक्ति को टिकट मिला तो दूसरे को नहीं मिलेगा.

आपकी पार्टी में दक्षिण भारत से कोई नहीं है.
ये हकीकत है, पर हमारी पार्टी से लोग धीरे-धीरे जुड़ रहे हैं. अभी तो शुरुआत है.

इतने सारे अलग-अलग लोग, अलग सोच, आपको लगता है कि आप मिलकर चल पाएंगे या फिर यहां भी अरविंद तानाशाह होंगे?
ऐसा नहीं है. आप संविधान पढ़ें तो पाएंगे कि पहली बार इस पार्टी में राइट टू रिकॉल है.

क्या आपके बच्चे पॉलटिक्स में आएंगे?
नहीं. एक पार्टी में या तो मैं रहूंगा या मेरे बच्चे. वैसे भी हम राजनीति में सत्ता के लिए नहीं आए हैं, यह बात समझने की जरूरत है.

जैसे सुब्रमण्यम स्वामी 2जी मामले में कोर्ट गए और सुप्रीम कोर्ट ने जांच बिठाई. उस कमेटी ने राजा, कनिमोलि को जेल भेजा.
वो वापस बाहर आ गए. यही हम कहते हैं कि इस देश में बेल होती है पर जेल नहीं होती. और उन्हें सजा नहीं मिलेगी, बेशक आप मुझसे लिखवा लें. जो बड़े-बड़े मगरमच्छ चोरी कर रहे हैं, उन्हें जेल में डालने के लिए सीबीआइ को बनाया गया था पर 50 साल के इतिहास में आज तक सीबीआइ ने नर बहादुर भंडारी, सुखराम और बंगारू लक्ष्मण जैसे छोटे लोगों को ही जेल भेजा है.

आप इतने बड़े लोगों पर आरोप लगाते हैं, आपको डर नहीं लगता?
देश लुट रहा है. अगर भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस को भी डर लगता तो आज ये देश आजाद न होता. ये दूसरी आजादी की लड़ाई है. यह सत्ता की लड़ाई नहीं है.

लोकपाल बिल बनकर तैयार है. तमाम सांसदों की सहमति से इसे तैयार किया गया है और यह लोकपाल पहले से बेहतर है.
बेहतर नहीं है. सभी पार्टियां मिली हुई हैं. लोकपाल केवल पोस्ट ऑफिस है. किसी भी मामले की जांच सीबाआइ करेगी और सीबीआइ सरकार के कंट्रोल में है.

पर अब तो प्रधानमंत्री लोकपाल के दायरे में हैं. यही तो आपकी मांग थी.
आप समझने की कोशिश कीजिए. लोकपाल को जांच करने की पावर भी नहीं. अगर मैं किसी की शिकायत लोकपाल को करता हूं तो वे मेरी इस शिकायत को सीबीआइ को फारवर्ड कर सकते हैं. सरकार सीबीआइ को स्वंतत्र क्यों नहीं कर सकती? क्यों वह हमें झुनझुना दे रही है?

कुछ न होने से बेहतर कुछ तो सही.
आप खुश हो सकते हैं, देश की जनता खुश नहीं है, मैं खुश नहीं हूं. हम चाहते हैं कि अगर रॉबर्ट वाड्रा ने चोरी की है तो उन्हें सजा मिले.

“लोकपाल केवल पोस्ट ऑफिस है. सरकार सीबीआइ को स्वतंत्र क्यों नहीं कर सकती?”
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