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भ्रष्टाचार के खिलाफ भारत समर्थक

अन्ना के आह्वान का एक वर्ष पूरा!!


आज अन्ना आंदोलन के लिए एक खास दिन है। ठीक एक साल पहले आज ही के दिन एक 74 साल के बुजुर्ग के आह्वान पर इस देश का नौजवान जाग उठा था। भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना ने जो बिगुल फूंका उसकी लौ आज भी जल रही है। 


साल 2011 को याद रखा जाएगा, आम हिंदुस्तानी की ऐतिहासिक पहलकदमी के लिए। वो आम आदमी, जिसके बारे में कहा जाता है कि वो अपनी ही दुनिया में मस्त रहता है। कोई सोच भी नहीं सकता था कि तंत्र में आई खामियों को दुरुस्त करने के लिए सड़कों पर उतरेगा। आम आदमी को उसकी ताकत का अहसास दिलाया एक 74 साल के बुजुर्ग, अन्ना हजारे ने। अन्ना हजारे का हाथ पकड़कर आम आदमी ने ऐसा तूफान खड़ा किया कि केंद्र की सरकार को बार-बार उसके आगे झुकना पड़ा। लेकिन वो सरकार ही क्या, जो आसानी से आम आदमी की बात सुने, इसलिए यह लड़ाई अभी भी जारी है। 


अब भी है अन्ना में दम, लोकपाल को भरपूर समर्थन! 


5 अप्रैल 2011 को जब अन्ना लोकपाल की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर अनशन पर बैठे, तो देश के ज्यादातर लोग न तो लोकपाल के बारे में ज्यादा जानते थे और न ही अन्ना की शख्सियत के बारे में, लेकिन एक साल के अंदर 74 साल के इस बुजुर्ग ने एक नई कहानी लिख दी। उसने न केवल देश के युवाओं को उनकी ताकत का अहसास कराया, बल्कि यह सपना भी दिखाया कि देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल सकती है। लेकिन इस एक साल में कई तरह के उतार-चढ़ाव आए। अन्ना और उनकी टीम को कई मुश्किलों से गुजरना पड़ा। शुरूआत करते हैं 25 मार्च 2012 को जंतर-मंतर पर हुए अन्ना हजारे के एक दिन के अनशन से। 


अन्ना के इस एक दिन के अनशन का मकसद था, भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ते हुए अपनी जान गंवाने वाले शहीदों के परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करना। टीम अन्ना के लिए यह आयोजन बेहद अहम था। अन्ना विरोधी कहने लगे थे कि अन्ना का तिलस्म अब टूट चुका है, और उनके लिए भीड़ जुटाना मुमकिन नहीं होगा, लेकिन जैसे ही अन्ना अनशन स्थल पर पहुंचे, विरोधियों की पेशानी पर बल पड़ना शुरू हो गए।


दिन भर जंतर-मंतर पर लोगों की भारी भीड़ जुटी रही। अन्ना की ताकत यानी युवा देश के अलग अलग हिस्सों से जंतर-मंतर पर जुटे और लगा कि आंदोलन एक बार फिर तेजी पकड़ने लगा है। अन्ना और उनकी टीम के लिए यह बेहद जरूरी था। दरअसल, पिछले साल के अंत में मुंबई के एमएमआरडीए मैदान पर हुआ अनशन टीम अन्ना को गहरा घाव देकर गया था। उस वक्त लोकसभा में लोकपाल पर बहस चल रही थी, और अन्ना मुंबई में अनशन पर बैठ गए थे। लेकिन एमएमआरडीए मैदान में लोगों की भीड़ नहीं जुटी। टीम ने पिछले एक साल में कभी ऐसा समय नहीं देखा था। गहरी निराशा में छा गई थी। लिहाजा सरकार को अपनी ताकत दिखाने से ज्यादा टीम का मनोबल बढ़ाने के लिए 25 मार्च के अनशन को सफल होना जरूरी था। ऐसा ही हुआ, और टीम एक बार फिर नई ऊर्जा के साथ लड़ने के लिए तैयार हो गई। अब लड़ाई केवल लोकपाल की नहीं, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन की है।


अन्ना हजारे के नाम से मशहूर 74 साल के इस बुजुर्ग को 5 अप्रैल 2011 तक महाराष्ट्र में ही समाजसेवा के काम के लिए जाना जाता था, लेकिन इस दिन के बाद अन्ना का जादू ऐसा लोगों पर चला कि देश के कोने-कोने में ‘मैं हूं अन्ना’ की टोपी पहने लोग सड़कों पर निकल आए। 


अन्ना की सरकार को चेतावनी, होगा बड़ा आंदोलन 


5 अप्रैल 2011 को शुरू हुए अनशन के छह महीने पहले से अन्ना हजारे और उनकी टीम सरकार से लगातार लोकपाल की मांग कर रही थी। अन्ना ने इससे पहले 30 जनवरी को भी दिल्ली के रामलीला मैदान पर एक दिन की रैली की थी, लेकिन उसमें जुटी भीड़ में ज्यादातर बाबा रामदेव के समर्थक थे। लिहाजा सरकार अन्ना हजारे को ज्यादा गंभीरता से नहीं ले रही थी। हालांकि अन्ना ने चेतावनी दी थी कि अगर सरकार मजबूत लोकपाल बिल नहीं लेकर आई, तो वे 5 अप्रैल से अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठ जाएंगे। लेकिन सरकार के कानों पर जू नहीं रेंगी। शायद सरकार अन्ना के अनशन, सच्चाई और त्याग की ताकत का अंदाजा नहीं लगा पाई। खैर 5 अप्रैल 2011 का दिन आया, यह वह दिन था जिसने देश में एक बदलाव का संकेत दिया। 


अन्ना का अनशन शुरू हुआ और देखते ही देखते ही लोगों की भारी भीड़ जुटनी शुरू हो गई। हर घंटे, हर दिन लोगों का हुजूम बढ़ता चला गया। इस बीच खबरे आईं कि सरकार और अन्ना हजारे की टीम के बीच बातचीत शुरू हो गई है। लेकिन टीम अन्ना की ओर से इसकी पुष्टि नहीं की गई। आखिरकार 98 घंटे बाद अन्ना के सामने सरकार झुकती हुई नजर आई। तब तक अन्ना हजारे देश भर में भ्रष्टाचार के विरोध का प्रतीक बन गए थे। अन्ना को आश्वासन दिया गया कि एक संयुक्त समिति बनाई जाएगी, जो लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करेगी। अन्ना की धमक का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मनमोहन सिंह सरकार के सबसे वरिष्ठ मंत्री प्रणब मुखर्जी इस कमेटी के अध्यक्ष थे, तो अन्ना की मांग पर, सरकार को इस कमेटी के सहअध्यक्ष के रूप में वरिष्ठ वकील और अन्ना के करीबी सहयोगी शांतिभूषण को नियुक्त करना पड़ा। पहली बार इस तरह की सरकारी कमेटी में पांच बड़े मंत्रियों के साथ आम लोगों के प्रतिनिधि के रूप में अन्ना हजारे और उनकी टीम के पांच लोगों को भी शामिल किया गया। लेकिन सरकार ने एक बार फिर अन्ना को धोखा दिया।


अन्ना ने अपना अनशन खत्म करते हुए घोषणा की थी कि अगर 16 अगस्त तक सरकार लोकपाल बिल लेकर नहीं आई, तो वे दोबारा से अनशन पर बैठ जाएंगे। शायद अन्ना को सरकार की नीयत पर पहले से ही शक था। 16 अगस्त आते-आते यह साफ हो गया था कि सरकार की नीयत मजबूत लोकपाल बिल लाने की नहीं है। 


15 अगस्त 2011, अन्ना शाम को अचानक राजघाट जा पहुंचे। जैसे ही मीडिया को इसकी खबर मिली, सभी राजघाट की तरफ दौडे, देखते ही देखते लोगों का भारी हुजूम वहां इकट्ठा हो गया। पूरा राजघाट लोगों की भीड़ से भर गया। अगले दिन यानी 16 अगस्त की सुबह दस बजे से अन्ना को अनशन पर बैठना था।

16 अगस्त 2011, अन्ना अपने सहयोगी प्रशांत भूषण के मयूर विहार वाले घर पर थे। सुबह से ही वहां मीडिया की भारी भीड़ जुट गई थी। लोग भी आने शुरू हो गए थे। लेकिन सुबह ही वहां भारी तादाद में पुलिसबल भी तैनात था। सभी के मन में कौतुहल था कि अगले पल क्या होने वाला है। सरकार ने फिर ऐसी गलती की, जिसका भारी खामियाजा उसे भुगतना पड़ा। अन्ना को पुलिस ने सुबह-सुबह ही फ्लैट से हिरासत में ले लिया। दलील दी गई कि अगर उन्हें अनशन स्थल पर जाने की अनुमति दी गई, तो शहर की शांति भंग हो सकती है। 


सिर्फ हिदायत देकर छोड़ा टीम अन्ना को लोकसभा ने 


अन्ना ने अपने समर्थकों से शांति बनाए रखने की अपील की और घोषणा कर दी कि पुलिस उन्हें कहीं भी ले जाए, उनका अनशन जारी रहेगा। वे चाहे जेल में रहें या बाहर, अनशन तो होकर रहेगा। बस फिर क्या था अन्ना की इस भावुक अपील ने देश भर के आम जनमानस पर भारी असर किया। लोगों को लगा कि 74 साल का एक बुजुर्ग उनके लिए लड़ रहा है। एक ऐसा बुजुर्ग, जिसके पास अपना कुछ नहीं हैं, जो मंदिर में रहता है, जिसके लिए देशवासी ही परिवार के सदस्य हैं। टीम अन्ना को भी लग रहा था कि सरकार ऐसा कोई कदम उठा सकती है, लिहाजा टीम के कुछ सदस्यों को कहा गया था कि अगर अन्ना को हिरासत में लिया जाए, तो वे बाहर रहकर लोगों को जागरूक करने का काम करें। लेकिन पुलिस ने अन्ना के साथ-साथ अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया जैसे सहयोगियों को भी हिरासत में ले लिया। इस समय टीम अन्ना को कोई रास्ता नहीं दिखाई दे रहा था। सब कुछ भविष्य पर छोड़ दिया गया था। 


बहरहाल, टीम अन्ना की चिंता कुछ ही देर में दूर हो गई। इधर पुलिस ने अन्ना और उनकी टीम को हिरासत में लिया, उधर देश भर में प्रदर्शन शुरू हो गए। अन्ना को उनके फ्लैट से ले जाने में पुलिस को खासी मशक्कत करनी पड़ी। जहां तक नजर जा रही थी, लोगों की भारी भीड़ इकट्ठा थी। क्या जंतर-मंतर, क्या रामलीला मैदान, क्या राजघाट, क्या शहीद पार्क, सभी जगह लोग इकट्ठा हो गए थे। पुलिस को शायद कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था। लोगों को बस में भर कर जेल भेजना शुरू किया गया। तीन-चार जगह अस्थायी जेलें बनाई गईं। शाम होते-होते ये जेलें पूरी तरह से भर गई। यह एक नए भारत की तस्वीर था। वह आम आदमी जिसके बारे में कहा जाता था कि वह आंदोलन की राह से दूर हो गया है और वह अपने घर से बाहर नहीं निकलता। वह आम आदमी अन्ना के साथ जेल जाने को तैयार था। 


क्या महिला, क्या पुरुष, क्या बुजुर्ग, सभी जेल जाने को तैयार थे। शाम होते-होते सरकार और पुलिस के हाथ-पैर फूल गए। अन्ना हजारे को आनन-फानन में जेल से छोड़ने का फैसला किया गया। लेकिन इस बुजुर्ग ने ऐसा दांव चला कि सरकार पूरी तरह से बैकफुट पर आ गई। अन्ना हजारे ने साफ कर दिया कि जब तक उन्हें बिना शर्त अनशन करने की अनुमति नहीं दी जाएगी, वे जेल से बाहर नहीं जाएंगे और जेल में ही उनका अनशन जारी रहेगा। अब तक तिहाड़ जेल के बाहर लोगों की भारी भीड़ जुट गई थी। अगले दिन सुबह तो तिहाड़ के सामने वाली सड़क पर सिर्फ और सिर्फ अन्ना की टोपी पहने लोग ही दिखाई दे रहे थे। बहरहाल 3 दिनों तक देश भर में इसी तरह सड़कों पर अनशन चला और सरकार को फिर झुकना पड़ा। अन्ना को रामलीला मैदान में अनशन करने की अनुमति मिली। अन्ना जैसे ही जेल से बाहर निकले, लोगों में भारी जोश भर गया। राजघाट होते हुए अन्ना रामलीला मैदान पहुंच गए।


रामलीला मैदान में 13 दिन तक अन्ना का अनशन चला। ये 13 दिन मामूली नहीं थे। देश के नक्शे पर नई इबारत नजर आ रही थी। एक ऐसी इबारत, जिसे सड़कों पर आम लोगों ने लिखा था। यह अन्ना का जादू था। इस अनशन ने देश की सरकार को यह दिखा दिया था कि आम आदमी की ताकत सबसे बड़ी है। 13 वें दिन सरकार झुकी और ऐसी झुकी कि आम आदमी को भरोसा हो गया कि अगर वह एकजुट हो जाए, तो किसी भी लड़ाई को जीता जा सकता है। 


अन्ना दहाड़े, संसद में केवल ‘शुद्ध’ लोगों को बैठने का अधिकार! 


अन्ना ने आम आदमी को उसकी इसी ताकत का अहसास करा दिया था। जनता ने देखा कि देश की संसद में अन्ना हजारे से अनशन खत्म करने की अपील की गई। देश के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने सदन में कहा कि अन्ना हजारे की तीन मांगों को मानने के लिए पूरी संसद में सहमति है। इस तीन मांगों में राज्यों में लोकायुक्त, सिटिजन चार्टर और निचली अफसरशाही को लोकपाल के दायरे में लाना शामिल था। 


केंद्रीय मंत्री विलास राव देशमुख प्रधानमंत्री का पत्र लेकर अन्ना के पास पहुंचे। टीम अन्ना को भी लगा कि अगर निचली अफसरशाही लोकपाल के दायरे में आ जाएगी, तो लोगों को बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार से मुक्ति मिलेगी। अन्ना ने एक बार फिर अपना अनशन खत्म किया। लेकिन सरकार ने वही किया जिसकी आशंका थी। देश को अब तक लोकपाल नहीं मिला है। पर अन्ना ने हिम्मत नहीं हारी है।

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