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भ्रष्टाचार के खिलाफ भारत समर्थक

अरविन्द के मुखारबिन्द से


मीडिया के आंदोलनकारी अन्ना हजारे एक दिन के लिए दिल्ली आये और विवाद पैदा करके चले गये. विवाद की शुरूआत जंतर मंतर पर एकबार फिर अरविन्द केजरीवाल से हुई लेकिन गूंज सुनाई पड़ी सोमवार को संसद में. अन्ना हजारे के साथी "चोर की दाढ़ी में तिनका" खोजने लगे तो शरद यादव को यह बात बुरी लग गई. इतवार को तो शरद ने कुछ नहीं कहा लेकिन सोमवार को वे संसद में जमकर गरजे. बरस इसलिए नहीं पाये क्योंकि वे संसद में थे, लेकिन गरजने में कोई संकोच नहीं किया.


लेकिन केवल शरद यादव ही नहीं गरजे. सुषमा स्वराज भी गरजीं. लालू यादव भी गरजे. कांग्रेस के संजय निरुपम भी चिल्लाए कि "ऐसी भाषा तो हम लोग भी इस्तेमाल नहीं करते जैसा टीम अन्ना कर रही है." संजय पर शक करने की जरूरत नहीं है. वे वह नहीं कह रहे थे जो आप समझ सकते हैं. लेकिन सवाल तो है.


सवाल यह है कि देश में भ्रष्टाचार मिटाने के लिए संगठित हुई अन्ना हजारे की मंडली इतनी जल्दी हताश और निराश क्यों नजर आ रही है? हालांकि टीम अन्ना के महत्वपूर्ण सदस्य अरविन्द केजरीवाल नेताओं के बारे में जो बयान दे रहे हैं, चाय की दुकान पर बैठा कमोबेश हर नागरिक वैसा ही या फिर उससे भी "साफ सुथरा" बयान देता रहता है. तो फिर अरविन्द केजरीवाल ऐसा क्या कह देते हैं कि पूरी संसद अपमानित महसूस करने लगती है?


अरविन्द केजरीवाल के बयानों से इतना तो साफ हो जाता है कि वे राजनीतिक तौर पर बयानबाज नहीं है. वे संसद को सर्वोच्च कहते हैं और उसे लोकतंत्र का मंदिर बताते हैं और वहां बैठे लोगों को चोर. डकैत और बलात्कारी बताते हैं. यह विरोधाभासी दृष्टिकोण है. या तो संसद मंदिर नहीं है या फिर वहां बैठे लोग चोर, डकैत तथा बलात्कारी नहीं है. अगर हम यह मानते हैं कि मंदिर में प्रवेश कर देने मात्र से सारे पाप धुल जाते हैं तो नेताओं के अतीत को नहीं खंगालना चाहिए, लेकिन अगर हम ऐसा नहीं मानते हैं तो फिर इन चोर, डकैत और बलात्कारियों की मौजूदगी के बाद इसे मंदिर का दर्जा कैसे दिया जा सकता है?


अरविन्द केजरीवाल की सोच में खोट है. वे आधे अधूरे तरीके से मु्ददों को न केवल समझते हैं बल्कि उसे ऊट पटांग तरीके से उठाते भी है. यह अरविन्द केजरीवाल ही हैं जो दिल्ली में अन्ना हजारे के आंख कान है. सरकार. अन्ना की टीम और अन्ना हजारे के बीच एकमात्र पुल अगर कोई है तो अरविन्द केजरीवाल हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि अन्ना हजारे अरविन्द केजरीवाल की खोज हैं. यही अरविन्द केजरीवाल और मनीष सिसौदिया अन्ना को रालेगढ़ से उठाकर दिल्ली लाये थे मूर्ति 
बनाकर बिठाने के लिए और अपना आंदोलन चलाने के लिए.


पिछले साल अप्रैल में जब जंतर मंतर पर अन्ना हजारे का पहला सफल धरना हुआ था तब अरविन्द केजरीवाल ही एकमात्र सूत्रधार बनकर उभरे थे. अन्ना हजारे के आस पास जो अरविन्द की पसंद नहीं थे वे धीरे धीरे किनारे हो गये और खुद अरविन्द केजरीवाल लीडर बन गये. उनको इसका हक था कि वे लीडर हो जाते क्योंकि देश के लिए अन्ना आखिरकार उन्हीं की खोज हैं. लेकिन जंतर मंतर पर अरविन्द की कमजोर राजनीतिक समझ सामने आई और जिस बात पर समझौता होकर अनशन टूटा वह बहुत कमजोर था. अगर अरविन्द की जगह कोई दूसरा निर्णय करनेवाला होता तो शायद उस वक्त देश को अब तक का सबसे बड़ा जन आंदोलन मिल जाता.


लेकिन पांचवे दिन अधबीच में अन्ना के अनशन का टूटना इस आंदोलन की कमजोरी की निशानी बन गया. इसके बाद रामलीला मैदान में भी अरविन्द केजरीवाल की जिद्द ने अन्ना के अनशन को लंबा खींचा. सरकार वह अगले तीन चार दिनों में ही देने के लिए तैयार थी जो उसने दस बारह दिनों बाद दिया, तो फिर अनशन को इतना लंबा खींचने का तुक क्या था? आखिर में तो टीम अन्ना को कुछ मिला भी नहीं सिवाय इसके कि लोकपाल बिल एक बार फिर लोकसभा से पास हो गया जो कि वह पहले भी कई बार हो चुका है.


यह सब इसलिए क्योंकि अरविन्द केजरीवाल कमजोर राजनीतिक समझ के आदमी हैं. अन्ना हजारे और अरविन्द केजरीवाल के सामने प्रासंगिक बने रहने का एकमात्र मौका यही है कि वे बयानबीर बनकर आंदोलन को जिन्दा रखें. ऐसा संभव भी इसलिए हो जाता है कि क्योंकि अन्ना का आंदोलन मीडिया का आंदोलन है. मीडिया उनके मुख से बोली गई बातों को टीआरपी मीटर पर चढ़ाता है और दमभर दोहन करता है. अगर ऐसा नहीं होता तो अन्ना हजारे खुद दिल्ली से बाहर देश के दूसरे हिस्सों में जाते और जो कहा था वह करते. लेकिन अन्ना ऐसा नहीं करते. वे दिल्ली आते हैं, भारत माता की जय बोलते हैं और वापस चले जाते हैं.


ऐसे में अरविन्द केजरीवाल के ऊंट पटांग बयान ही उनके आंदोलन को जिन्दा रखे हुए हैं. अगर यह बयानबाजी बंद हो जाए तो शायद अन्ना का आंदोलन भी हवा हो जाए. वैसे भी अब यह आंदोलन खुद ही चौराहे पर आ खड़ा हुआ है और शीर्ष के रणनीतिकार भी समझ नहीं पा रहे हैं कि आगे किधर जाएं? जब तक नया रास्ता नहीं मिलता है तब तक बयान देकर विवादास्पद बने रहने में क्या बुराई है?
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