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एचएसबीसी यानि गड़बड़ बैंकों का सरगना

संदेह के घेरे में विदेशी बैंक : अरविंद केजरीवाल के द्वारा लगाये गये आरोपों ने एचएसबीसी की साख को फिर से दागदार कर दिया है। दरअसल एचएसबीसी का कार्यकलाप शुरू से ही विवादास्पद रहा है। अप्रैल, 2011 में डेरीवेटिव उत्पाद को गलत तरीके से बेचने के कारण उस पर भारी जुर्माना लगाया जा चुका है। इसके बरक्स दिलचस्प तथ्य यह है कि बीमा और म्युचुअल फंड जैसे उत्पादों को बेचने के लिए भी वह गलत दावों का सहारा लेता रहा है।

अपने वक्तव्य में केजरीवाल ने कहा है कि एचएसबीसी अपने नेटवर्क की सहायता से उद्योगपतियों के कालेधन को सफेद बनाने का काम कर रहा है। उनके अनुसार भारतीय स्टेट बैंक में खाता खुलवाने से आसान काम किसी स्विस बैंक में खाता खुलवाना है, लेकिन इसके लिए आपको एचएसबीसी के प्रतिनिधि से संपर्क करना होगा। एचएसबीसी का प्रतिनिधि महज फोन पर दिये गये निर्देष के आधार पर आपके घर आकर फार्म भरवाने से लेकर पैसा जमा करवाने तक का कार्य कर देगा। दूसरे षब्दों में कहें तो एचएसबीसी से संपर्क करने के बाद ग्राहक को खाता खुलवाने से लेकर खाते के संचालन तक के लिए चिंता करने की जरुरत नहीं होती है। हर तरह की सेवा बैंक आपके घर पर मुहैया करवाता है।

इस संदर्भ में मजेदार बात यह है कि स्विटजरलैंड में खाता रखने वालों की सूची में मुकेश अंबानी का नाम जनवरी, 2012 में गलती से एचएसबीसी डाल चुका है। इसके लिए बैंक प्रबंधन मुकेश अंबानी से माफी भी मांग चुका है। ज्ञातव्य है कि पहले से ही अमेरिका में एचएसबीसी कालेधन को वैध बनाने के आरोपों का सामना करता रहा है। नियमों के उल्लंघन के कारण उस पर आपराधिक मुकदमा शुरू करने के अलावा 1.5 अरब डालर जुर्माना लगाये जाने की संभावना है। जुलाई, 2012 में भी अमेरिकी सीनेट की स्थायी उपसमिति ने अपने जाँच में एचएसबीसी को हवाला लेन-देन (एएमएल) में संलिप्त पाया था। उल्लेखनीय है कि वाशिंगटन में सीनेट की उप समिति की सुनवाई के दौरान एचएसबीसी अपनी गलतियों के लिए माफी मांग चुका है।

भारत में चल रहे एचएसबीसी के कारोबार में भी तमाम तरह की विसंगतियां पाई गई हैं। खास करके बड़े स्तर पर चल रहे संदिग्ध वित्तीय लेन-देन के मामलों में। कई बार चेतावनी देने के बाद भी उसके द्वारा उनका निराकरण नहीं किया गया है। ऐसे ही कुछेक मामलों में भारतीय रिजर्व बैंक की जाँच अभी भी जारी है।

एचएसबीसी पर केजरीवाल के द्वारा लगाये गये आरोपों ने एक बात तो साफ कर दिया है कि भारत में बैंकिंग नियामक प्रणाली अंदर से एकदम खोखला है। वह विदेशी और निजी बैंकों पर लगाम लगाने में असक्षम है। इसी वजह से विदेशी व निजी बैंक भारतीय रिजर्व बैंक के द्वारा जारी दिशा-निर्देशों की अनदेखी कर रहे हैं। जाहिर है सिर्फ सरकारी बैंकों पर नियम-कानून का चाबुक चलाने से बात नहीं बनेगी। आज काले धन की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति डांवाडोल है। काला धन को वैध बनाना एक गंभीर आरोप है। किसी बैंक का इस गलत प्रक्रिया में शामिल होना अर्थव्यवस्था एवं देश दोनों के लिए खतरे की घंटी है।

एचएसबीसी के कार्यकलापों में पारदर्शिता के अभाव के कारण अन्य विदेशी व निजी बैंकों के काम-काज को भी भारत में संदेह की नजर से देखा जा रहा है। लिहाजा, जरुरत इस बात की है कि एचएसबीसी के साथ-साथ सभी निजी एवं विदेशी बैंकों के बही खातों की सघन जाँच करवाई जाए। स्पीड मनी के लालच में नियमों की अनदेखी करना एक गंभीर अपराध है।

छोटे व मझोले शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों में निजी व विदेशी बैंकों का कारोबार करने का तरीका पारदर्शी नहीं है। उनके उत्पादों के साथ झूठ का मुल्लमा चढ़ा हुआ होता है। बीमा और म्युचुअल फंड जैसे उत्पादों को बेचने में भी उनका वैसा ही रवैया रहता है। उनके प्रतिनिधि जो बोलते हैं, वे करते नहीं। बिना किसी शाखा के भी ग्रामीण इलाकों में उनके एजेंट घूमते रहते हैं, जो किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड जैसा सस्ता ऋण तो मुहैया नहीं करवाते, लेकिन ट्रैक्टर लोन जरूर दे देते हैं। उसके बाद शुरू होता है उनका महाजनी खेल। ब्याज ऋण राशि पर वसूली जाती है, न कि घटती राशि पर। मनमाफिक ब्याज वसूलने के साथ-साथ एकाध किस्त का डिफाल्टर होने पर उन पर जमकर जुर्माना लगाया जाता है। वसूली एजेंट के रूप में गुण्डों की सेवाएं लेना उनके लिए आम बात है।

अब सवाल यह उठता है कि क्या विदेशी व निजी बैंकों की इन करतूतों से भारतीय रिजर्व बैंक अनजान है ? अगर नहीं, तो ठीक अपने नाक के नीचे वह इसतरह के गैर कानूनी काम करने की इजाजत इन बैंकों को क्यों दे रहा है? इसके इतर आजकल सावधि जमाओं के अर्जित ब्याज पर सभी बैंकों में नियम-कानून को ताख पर रखकर अनावश्यक रुप से टीडीएस काटा जा रहा है, जबकि नियम यह है कि टीडीएस काटने से पहले ग्राहकों से फार्म 15 एच या 15 जी लेना चाहिए। उक्त फार्म को ग्राहक द्वारा भरकर नहीं देने की स्थिति में ही बैंकों को टीडीएस काटना चाहिए।

पड़ताल से स्पष्ट है कि केजरीवाल के आरोपों को दरकिनार नहीं किया जा सकता है। बैंकिंग नियामक प्रणाली में व्याप्त कमियों व खामियों का फायदा उठा कर कुछ विदेशी व निजी बैंक मुनाफे के लिए गलत काम कर रहे हैं। कुछ खामियाँ सरकारी बैंकों में भी व्याप्त है। ऐसे में जरूरी है कि समय रहते सरकार इन पर काबू पाए। चूँकि मामला देश के वितीय संस्थानों से जुड़ा है, इसलिए इस आलोक में जरा सी भी चूक देश को बर्बादी के कगार पर ले जा सकता है।


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