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भ्रष्टाचार के खिलाफ भारत समर्थक

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अलग रास्ते से होगा जनता का नुकसान


जनांदोलनों के लिहाज से साल 2011 पूरी दुनिया के लिए खास था। उसी समय भारत में भी अन्ना हजारे ने जनलोकपाल कानून की मांग पर जबर्दस्त आंदोलन छेड़ा। लेकिन समय के साथ टीम अन्ना में मतभेद पैदा हो गए और इस साल 10 सितम्बर को टीम अन्ना का विभाजन हो गया। अन्ना ने 28 सितम्बर को अपने ब्लॉग में केजरीवाल पर आरोप लगाते हुए लिखा कि ' दुर्भाग्य से आंदोलन विधेयक आने के पहले ही बंट गया। कुछ लोग राजनीतिक रास्ता अपनाना चाहते हैं , तो कुछ आंदोलन को जिंदा रखना चाहते हैं ' । 9 अक्टूबर को अन्ना हजारे ने 15 सदस्यीय समन्वय समिति की घोषणा की , जिसमें आठ पुराने और सात नए सदस्य शामिल किए गए। अन्ना की यह नई टीम गैर राजनैतिक तरीके से भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को और आगे बढ़ाएगी। बड़ा सवाल यह है कि जन लोकपाल आंदोलन का क्या होगा ? अन्ना का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन कहां तक पहुंच पाएगा ? क्या केजरीवाल राजनीति के रास्ते राजनीति का सुधार और शुद्धिकरण कर पाएंगे ? 

कौन-कौन हैं टीम अन्ना और टीम केजरीवाल में जानें... 

अन्ना हजारे विगत पिछले कई साल से सामाजिक आंदोलनों , अहिंसा , सत्याग्रह आदि के द्वारा मजबूत लोकपाल , सत्ता के विकेन्द्रीकरण , चुनाव सुधार , राइट टु रिजेक्ट , सिटिजन चार्टर और व्यवस्था परिवर्तन की मांग को पुरजोर तरीके से उठाते रहे हैं। केजरीवाल के अन्ना से अलग होने से जनलोकपाल आंदोलन की गति मंद जरूर हुई है , लेकिन अन्ना के नए तेवर और टीम से नई ऊर्जा का प्रवाह भी हुआ है। आंदोलन प्रभावित हुआ है , लेकिन खत्म नहीं। 

अरविंद केजरीवाल ने अपने राजनीतिक दल की घोषणा कर दी है। अन्ना की टीम से अलग होने के बाद केजरीवाल ने धमाकेदार राजनीतिक पारी की शुरुआत मीडिया के ब्रेकिंग न्यूज और बड़े-बड़े खुलासों के जरिए की है। जहां पिछले कुछ दिनों से इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में बहस का केंद्र बने हुए हैं , वहीं वे किसी एक मुद्दे को उठाकर उसे नतीजे तक ले जाने में असमर्थ रहे हैं। कई मुद्दे एक साथ उठाने और उन्हें बीच में ही छोड़ते जाने का एक बुरा नतीजा यह हो सकता है कि केजरीवाल मुद्दों में ही खो जाएं और भ्रष्टाचार के गंभीर एवं संगीन मुद्दे जनता को मजाक लगने लगें। फेसबुक , ट्विटर , सोशल मीडिया और एनजीओ के जरिए महानगर केंद्रित आंदोलन चलाने और जनता के बीच राजनीतिक स्वीकृति स्थापित करने में गुणात्मक अंतर है। शहरी आंदोलन को गांव में ले जाना न सिर्फ चुनौतीपूर्ण है , बल्कि समाज से ईमानदार एवं साफ-सुथरी छवि के लोगों का चयन और भी कठिन है। 

ऐसा न हो कि केजरीवाल और उनकी टीम राजनीति के दलदल में फंसकर लक्ष्य को ही भूल जाएं और प्रबंधन के महत्वपूर्ण सिद्धांत ' लक्ष्य स्थानांतरण ' के आधार पर व्यवस्था-परिवर्तन से कोसों दूर चले जाएं। अन्ना और केजरीवाल के सामाजिक आंदोलन और राजनीतिक मार्ग कितने कामयाब होते हैं , ये तो समय ही बताएगा। लेकिन इसमें कोई दो मत नहीं है कि इन दोनों के अलगाव से भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन प्रभावित हुआ है और अंतत: नुकसान आम जनता का ही हुआ है। 

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