अन्ना टीम द्वारा सांसदों के लिए असंयमित भाषा का प्रयोग करने पर संसद में उठे बवाल ने अन्ना के भ्रष्टाचार के प्रति आंदोलन का रुख बदल दिया है। अब तो ऐसा लगता है जैसे भ्रष्टाचार की यह लड़ाई ‘अन्ना बनाम संसद’ में बदल कर रह गई है। कारण केवल इतना रहा है कि अन्ना के सिपहसालार मंच पर भाषण देते हुए जब अपार जन-समूह को सम्बोधित करने लगते हैं तो वे भूल जाते हैं कि जिन लोगों को ‘टारगेट’ बना कर वे अपने आंदोलन को गति देना चाह रहे हैं, वे जनता के चुने हुए प्रतिनिधि हैं और संसद में उन लोगों की आवाज उठाने के लिए कृतसंकल्प हैं।
पिछले सप्ताह टीम अन्ना ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित एक कार्यक्रम में मुहावरा ‘चोर की दाढ़ी...’ का प्रयोग कर सांसदों को सांकेतिक भाषा में ‘चोर’ कह कर सम्बोधित किया। इस तरह के संबोधन ‘शालीन’ और ‘संयमित’ भाषा के दायरे में नहीं आते। इस तरह के वक्तव्य केवल थोथा प्रचार दिलवा सकते हैं, लक्ष्य की प्राप्ति नहीं। इस असंयमित भाषा के प्रयोग से भ्रष्टाचार के विरुद्ध किए जा रहे संघर्ष को गहरा धक्का पहुंच सकता है। दुर्भाग्य से आज देश में तीन दुखद त्रासदियां हो रही हैं। देश में व्याप्त भयंकर भ्रष्टाचार गरीबी और अपराध को बढ़ाता चला जा रहा है। दूसरा, पूरी राजनीति भ्रष्टाचार को रोकने में असफल हो गई है। तीसरी त्रासदी यह हो रही है कि स्वामी रामदेव और अन्ना हजारे के अत्यंत महत्वपूर्ण आंदोलन अपने लक्ष्य से भटकते जा रहे हैं।
गत वर्ष 5 अप्रैल को अन्ना ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध जन लोकपाल बिल पारित करवाने के लिए आंदोलन प्रारम्भ किया था। सभी भारतवासियों ने इस आंदोलन को प्रबल समर्थन दिया था। दुर्भाग्य से आज यह आंदोलन ‘अन्ना बनाम संसद’ विवाद बन कर रह गया है। यह सत्य है कि संसद में 162 दागी सांसद हैं, पर इस सच को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि शेष 542 अच्छे भी हैं। मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि सभी राजनीतिक दलों में अच्छे और ईमानदार नेता हैं और अन्ना टीम द्वारा सांसदों के संबंध में अभद्र भाषा का प्रयोग करना अनुचित ही नहीं, अनापेक्षित भी है।
हम कई बार छोटी-छोटी बातों को लेकर इतने तल्ख हो जाते हैं कि छोटी-सी आलोचना को भी सह नहीं पाते। सांसदों को चाहिए कि वे अन्ना टीम की इस आलोचना का इतना अधिक नोटिस न लें और इस मुद्दे पर इतनी अधिक प्रतिक्रिया भी अच्छी नहीं लगती। सांसद 130 करोड़ जनसंख्या वाले देश के चुने हुए 700 प्रतिनिधि हैं। अत: आलोचना सुनने का साहस उनमें होना चाहिए।
अच्छा होता यदि संसद इस पूरी आलोचना को पूरी तरह अनसुना कर देती। अन्ना टीम को भी आत्मनिरीक्षण करने की जरूरत है। अन्ना टीम संघर्ष केवल भ्रष्टाचार के विरुद्ध करे, संसद के विरुद्ध नहीं।
सभी सांसदों को भी आत्मनिरीक्षण करने की आवश्यकता है। यह ठीक है कि सभी नेता भ्रष्ट नहीं हैं पर यह भी कटु सत्य है कि हम में से कुछ नेताओं ने इतना भयंकर भ्रष्टाचार किया और सत्ताधारी नेता इतनी निर्लज्जता से उस भ्रष्टाचार को संरक्षण दे रहे हैं कि नेताओं की पूरी बिरादरी बदनाम हो गई है। हजारों के किसी गांव में यदि दस गुंडे आसपास के गांव में अनाचार और भ्रष्टाचार करते हों तो वह गांव गुंडों का गांव पहचाना जाने लगता है। कभी नेताओं के लिए तालियां बजती थीं और आज खुलेआम गालियां दी जा रही हैं। यदि यही हालत रही तो सड़क पर नेताओं का चलना कठिन हो जाएगा।
