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1000 करोड़ चट, 8000 करोड़ खतरे में



गरीब महिलाओं और बच्चों को भोजन उपलब्ध कराने के लिए चलाई गई समेकित बाल विकास योजना (आईसीडीएस) को हथियाकर निजी कंपनियों ने एक हजार करोड़ रुपये का गोलमाल कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट कमिश्नर्स ऑफिस की एक रिपोर्ट ने यह खुलासा करते हुए बताया है कि सिर्फ महाराष्ट्र के ठेकेदार एक हजार करोड़ रुपये हड़प चुके हैं।

और यह सब तब हुआ है जब सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि आईसीडीएस के तहत राशन सप्लाई ठेकेदार नहीं करेंगे। इस योजना में राशन सप्लाई की इजाजत सिर्फ पंचायतों, सेल्फ हेल्प समूहों और महिला मंडलों को है। 2009 में राज्य सरकार ने नियम बदलते हुए महिला संस्थाओं को भी राशन सप्लाई के ठेकों के लिए आमंत्रित करना शुरू किया। उसके बाद सिर्फ तीन महिला मंडलों - वेंकटेश्वर महिला औद्योगिक सहकारी समिति, महालक्ष्मी महिला गृह उद्योग और बाल विकास बहुउद्देशीय औद्योगिक सहकारी संस्था और महाराष्ट्र महिला सहकारी गृह उद्योग संस्था लिमिटेड को एक हजार करोड़ रुपये की सारी सप्लाई के ठेके दे दिए गए। इन तीनों का उत्पादन से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं।

शुक्रवार में कोर्ट में दाखिल की गई इस रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि कॉन्ट्रैक्टर-कॉरपोरेट लॉबी ने कई राज्यों में 8000 करोड़ रुपये की राशन सप्लाई पर कब्जा कर लिया है। रिपोर्ट में कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और मेघालय का जिक्र खासतौर पर किया गया।

महाराष्ट्र के मामले को रिपोर्ट में विस्तार से बताया गया है कि किस तरह 1000 करोड़ रुपये की राशन सप्लाई को कब्जाने के लिए निजी कंपनियों ने अपने अपने महिला मंडल बना लिये हैं। कमिश्नर्स ने इस मामले में स्वतंत्र जांच कराने की सिफारिश की है। रिपोर्ट कहती है, 'सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में इस बात की जांच होनी चाहिए कि आईसीडीएस को राशन सप्लाई में राजनेताओं, अफसरों और निजी ठेकेदारों का गिरोह तो काम नहीं कर रहा है।'

आईसीडीएस 6 साल से कम उम्र के बच्चों और उनकी मांओं को कुपोषण से बचाने के लिए शुरू की गई थी।

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